पुकार
पुकार
न कोई खिलौना है,
न कोई अपना है,
मेरा तो एक ही सपना है।।
आए एक दिन ऐसा,
जाऊं स्कूल मालिक के बेटे जैसा।।
अभी तो हाल यही है,
बिन जूते की सर्दी, मास्टर की छड़ी है।।
घर का सारा काम करवाती है,
मालकिन राजा बेटे को बादाम खिलाती है।।
न कोई दिवाली है,
न कोई होली है,
बाल श्रम ही पटाखे-फुलझड़ी।।
बाल श्रम ही मेरी रंगोली।।
हर वक़्त रहता हूं मौन,
नही देखता sinchan, doraemon....
देखता हूं रोज शाम ढलते,
बाल श्रम मे बच्पन गलते।।
बस मै ही वो अभागा नही,
क्या हर चौराहे पे कोई चाय वाला "राजू" नही??
रहती है आंखें जिसकी हमेशा नम,
ढूंढता है कीचड़ में जो अपना बच्पन।।
हम वो मुरझाए फूल है,
हर सपना जिसका धूल है।।
कहलाएगा विश्वगुरु "भारत" अपना,
देखते है जो यह सपना।।
कैसे ये मुकम्मल होगा??
जबतक एक भी बच्चा बाल श्रम होगा।।
जबतक एक भी बच्चा बाल श्रम होगा।।